जाति की राजनीति के शोर में BJP का बड़ा दांव बिहार-यूपी की नियुक्तियों से क्या संकेत देना चाहती है पार्टी?

On: December 17, 2025 12:31 PM
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देश की राजनीति BJP में चल रही जातिवादी बहस के बीच भारतीय जनता पार्टी ने संगठन स्तर पर कई अहम नियुक्तियां कर बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। बिहार और उत्तर प्रदेश से जुड़ी इन नियुक्तियों को सिर्फ संगठनात्मक बदलाव के तौर पर नहीं, बल्कि नेतृत्व संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और आने वाले चुनावों की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सवाल यही है कि जाति आधारित राजनीति के माहौल में बीजेपी के ये फैसले आखिर क्या पैगाम दे रहे हैं।

बीजेपी ने हाल ही में नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। इसके साथ ही बिहार और उत्तर प्रदेश में भी नए प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए हैं। बिहार में संजय सरावगी को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी गई है, जबकि उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी को बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। इन नियुक्तियों ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज कर दी है।

पुराने पैटर्न पर नए फैसले

दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी ने इन नियुक्तियों में वही पैटर्न अपनाया है, जो पहले भी देखने को मिला है। 2023 के आखिर में तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद मुख्यमंत्री चयन के दौरान भी पार्टी ने कुछ इसी तरह का संतुलन साधने की कोशिश की थी। यानी पार्टी नेतृत्व का यह फैसला अचानक नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

यह सब ऐसे वक्त में हो रहा है, जब विपक्ष जातिवाद की राजनीति को पूरी ताकत से आगे बढ़ा रहा है। बिहार चुनाव हाल ही में संपन्न हुए हैं, जहां जाति सर्वे बड़ा मुद्दा रहा। इसके अलावा, कास्ट सेंसस को लेकर भी लगातार राजनीतिक माहौल गर्म है। इसी बीच केंद्र सरकार ने यह घोषणा भी कर दी है कि राष्ट्रीय जनगणना के साथ जातीय जनगणना भी कराई जाएगी।

बिहार की नियुक्तियों का सियासी संदेश

सबसे ज्यादा चर्चा बिहार से जुड़ी नियुक्तियों को लेकर हो रही है। नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है और वे बिहार से आते हैं। वे कायस्थ समुदाय से हैं, जो सवर्ण श्रेणी में आता है। वहीं, बिहार बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी भी सवर्ण वर्ग से हैं और वैश्य समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यानी बिहार से जुड़े दोनों बड़े पदों पर सवर्ण नेताओं की नियुक्ति की गई है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या बीजेपी को इसमें कोई राजनीतिक जोखिम नजर नहीं आया? खासकर तब, जब बिहार में जातिवाद की राजनीति लंबे समय से प्रभावी रही है।

हालांकि, बीजेपी के भीतर इसे जोखिम नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी का मानना है कि हालिया बिहार चुनावों में उसे सभी जातियों का समर्थन मिला है। जनादेश ने यह साफ कर दिया कि मतदाताओं ने सिर्फ जाति के आधार पर नहीं, बल्कि प्रदर्शन और नेतृत्व को देखकर वोट दिया।

बिहार चुनाव के आंकड़े क्या कहते हैं?

बिहार चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि बीजेपी को सिर्फ सवर्ण वोट ही नहीं, बल्कि पिछड़ी और अन्य जातियों का भी समर्थन मिला। पार्टी को लंबे समय से सवर्णों का समर्थन मिलता रहा है, लेकिन इस बार गैर-सवर्ण वर्गों का भरोसा भी उसके साथ जुड़ा दिखा।

यही वजह है कि बीजेपी सवर्ण नेताओं को कमान सौंपते वक्त किसी बड़े नुकसान की आशंका नहीं देख रही है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि बिहार में गठबंधन की ऐतिहासिक जीत ने नेतृत्व से लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं तक सभी का मनोबल बढ़ाया है।

यूपी में ओबीसी चेहरा, बिहार में सवर्ण नेतृत्व

अगर बिहार में नियुक्तियों को देखें तो तस्वीर एकतरफा लग सकती है, लेकिन उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने संतुलन बनाते हुए ओबीसी चेहरे को आगे किया है। नए यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी कुर्मी जाति से आते हैं, जो ओबीसी वर्ग में शामिल है।

पंकज चौधरी से पहले भूपेंद्र चौधरी यूपी बीजेपी अध्यक्ष थे, जो जाट समुदाय से आते हैं और ओबीसी नेता माने जाते हैं। उनसे पहले स्वतंत्रदेव सिंह भी ओबीसी चेहरा थे। यानी यूपी बीजेपी की कमान लगातार ओबीसी नेताओं के हाथ में रही है।

इस तरह बीजेपी एक तरफ सवर्ण नेतृत्व को आगे रख रही है, तो दूसरी तरफ पिछड़े वर्गों को भी प्रतिनिधित्व दे रही है। पार्टी का दावा है कि यही उसका सामाजिक संतुलन है।

नितिन नबीन और बंगाल कनेक्शन

नितिन नबीन की नियुक्ति को पश्चिम बंगाल की राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। कायस्थ समुदाय को बिहार में बंगाल के भद्रलोक वर्ग से जोड़कर देखा जाता है। माना जा रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर कायस्थ नेता को आगे लाकर बीजेपी बंगाल में भी सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश कर रही है।

बंगाल के बाद बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव बेहद अहम है। समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के मुकाबले बीजेपी अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में पंकज चौधरी जैसे ओबीसी नेता को यूपी बीजेपी अध्यक्ष बनाना रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।

चुनावी रणनीति में पुराना भरोसा

बिहार में बीजेपी ने धर्मेंद्र प्रधान को चुनाव प्रभारी बनाया था। इससे पहले 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी वही प्रभारी थे। यह दिखाता है कि पार्टी अपने आजमाए हुए रणनीतिकारों पर भरोसा बनाए रखना चाहती है।

यूपी में समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले का मुकाबला करने के लिए बीजेपी ओबीसी नेतृत्व को आगे रखकर यह संदेश देना चाहती है कि वह पिछड़े वर्गों की भी पार्टी है।

जातिवाद के आरोपों पर बीजेपी का जवाब

बीजेपी के पास इन नियुक्तियों को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब भी तैयार है। अगर बिहार में सवर्ण नेताओं को अहम पद दिए जाने पर सवाल उठते हैं, तो पार्टी यूपी में ओबीसी अध्यक्ष की नियुक्ति को संतुलन के तौर पर पेश करती है।

पार्टी का तर्क है कि वह जातिवादी दरारों को बढ़ाने की बजाय सामाजिक सामंजस्य की रणनीति पर काम कर रही है। 2023 में जब राजस्थान में भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया था, तो मध्य प्रदेश में मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर इसी तरह का संतुलन दिखाया गया था।

योग्यता बनाम जाति की राजनीति

बीजेपी यह भी संकेत देने की कोशिश कर रही है कि वह खुद को सिर्फ जाति आधारित राजनीति तक सीमित नहीं मानती। नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर पार्टी यह दिखाना चाहती है कि उसके लिए योग्यता, पार्टी के प्रति निष्ठा और चुनावी जरूरतें ज्यादा अहम हैं।

पार्टी का कहना है कि वह किसी “कास्ट कोटे” में बंधकर फैसले नहीं करती। बल्कि, संगठन और चुनावी रणनीति को ध्यान में रखकर नेतृत्व तय किया जाता है।

कांग्रेस से तुलना क्यों जरूरी?

इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस और बीजेपी के बीच फर्क भी साफ नजर आता है। बिहार चुनाव से पहले कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर दलित नेता राजेश राम को जिम्मेदारी सौंपी थी। मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने से लेकर चरणजीत सिंह चन्नी को एक समय पंजाब का मुख्यमंत्री बनाने तक, कांग्रेस खुद को दलित-पिछड़ा समर्थक पार्टी के तौर पर पेश करती रही है।

कांग्रेस लगातार कास्ट सेंसस की मांग करती रही है। कर्नाटक और तेलंगाना में ऐसे सर्वे कराए भी जा चुके हैं। बीजेपी की केंद्र सरकार पहले इस मुद्दे पर टालमटोल करती रही, लेकिन अब राष्ट्रीय जनगणना के साथ जातीय जनगणना की घोषणा कर चुकी है।

आखिर संदेश क्या है?

कुल मिलाकर बीजेपी की ये नियुक्तियां साफ इशारा करती हैं कि पार्टी जाति की राजनीति के शोर में भी संतुलन और रणनीति के साथ आगे बढ़ना चाहती है। बिहार में सवर्ण नेतृत्व और यूपी में ओबीसी चेहरा, दोनों मिलकर बीजेपी की उस सोच को दिखाते हैं, जिसमें वह खुद को सिर्फ एक जाति या वर्ग की पार्टी नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक आधार वाली पार्टी के तौर पर पेश करना चाहती है।

आने वाले चुनावों में यह रणनीति कितनी कारगर साबित होगी, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल बीजेपी ने साफ कर दिया है कि वह जातिवाद की बहस के बीच भी अपने फैसले खुद तय करने के मूड में है।

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