bangladesh-india फरवरी 2026 में बांग्लादेश में आम चुनाव होने हैं, लेकिन उससे पहले देश की राजनीति में जो सबसे तेज बदलाव दिख रहा है, वह है भारत-विरोधी बयानबाजी। कभी बंद कमरों तक सीमित रहने वाली एंटी-इंडिया बातें अब खुले मंचों, रैलियों और इंटरव्यू में सुनाई दे रही हैं। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि एक नेता ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को अलग-थलग कर देने तक की धमकी दे डाली। इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि क्या ढाका की सियासत भी अब मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मोइज्जू की तरह भारत-विरोध को चुनावी दांव बना रही है।
हसीना के सत्ता से हटते ही बदला सुर
अगस्त 2024 में बगावत के बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा। हसीना को लंबे समय तक भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार माना जाता रहा है। उनके शासन में भारत-विरोधी भावनाएं पूरी तरह खत्म तो नहीं थीं, लेकिन वे सीमित दायरे में रहती थीं। सत्ता परिवर्तन के बाद वही भावनाएं अचानक तेज आवाज में बदल गईं।
हसीना के जाते ही ढाका की राजनीति में एक खालीपन पैदा हुआ, जिसे भरने के लिए कई नए और पुराने दल सामने आए। इनमें से कई दलों ने खुद को स्थापित करने का सबसे आसान तरीका भारत के खिलाफ तीखी बयानबाजी को माना। देखते-देखते भारत-विरोध बांग्लादेश की सियासत का केंद्रीय मुद्दा बन गया।
चुनाव से पहले भारत क्यों बना केंद्र?
बांग्लादेश में दो महीने बाद आम चुनाव हैं। ऐसे में हर पार्टी अपनी पहचान और वोट बैंक मजबूत करने में जुटी है। मौजूदा हालात में भारत-विरोध एक ऐसा मुद्दा बन गया है, जिस पर बोलकर नेता तुरंत सुर्खियों में आ जाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश की कई पार्टियों को लग रहा है कि दिल्ली के खिलाफ जितना आक्रामक रुख अपनाया जाएगा, उतना ही चुनावी फायदा मिलेगा।
यही वजह है कि हाल के दिनों में बांग्लादेश की राजनीति भारत के इर्दगिर्द घूमती नजर आ रही है। कोई भारत पर दखल देने का आरोप लगा रहा है, तो कोई पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर भड़काऊ बयान दे रहा है।
हसनत अब्दुल्ला का बयान और बढ़ी चिंता
नेशनल सिटीजन पार्टी के नेता हसनत अब्दुल्ला ने हाल ही में जो बयान दिया, उसने इस बहस को और तेज कर दिया। उन्होंने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को अलग-थलग करने और वहां के अलगाववादियों को शरण देने जैसी बातें कहीं। इस बयान को न सिर्फ भारत में, बल्कि बांग्लादेश के भीतर भी कई लोगों ने खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना बताया।
यह पहली बार नहीं है जब बांग्लादेशी राजनीति में इस तरह के बयान आए हों, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इस तरह की भाषा का इस्तेमाल यह दिखाता है कि भारत-विरोध को जानबूझकर उभारा जा रहा है।
मालदीव का उदाहरण क्यों याद आ रहा है?
बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति की तुलना बार-बार मालदीव से की जा रही है। दो साल पहले मालदीव में आम चुनाव हुए थे। चुनाव से पहले प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव्स के नेता मोहम्मद मोइज्जू ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उन्होंने तत्कालीन सरकार पर भारत के बहुत करीब होने का आरोप लगाया और कहा कि भारत मालदीव के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है।
मोइज्जू ने ‘इंडिया आउट’ अभियान शुरू किया। इसके तहत मालदीव में तैनात भारतीय सैनिकों को हटाने और भारतीय उत्पादों के बहिष्कार की मांग की गई। उन्होंने चीन को अपना प्रमुख साझेदार बताते हुए भारत से दूरी बनाने की बात कही।
हैरानी की बात यह थी कि यह सब उस समय हुआ, जब मालदीव की अर्थव्यवस्था भारतीय पर्यटकों पर काफी हद तक निर्भर थी। इसके बावजूद चुनाव में मोइज्जू का एंटी-इंडिया नैरेटिव काम कर गया और वे सत्ता में आ गए। बाद में उन्हें अपने कई बयानों पर सफाई देनी पड़ी, लेकिन चुनावी जीत के लिए भारत-विरोध उनके लिए कारगर साबित हुआ।
क्या बांग्लादेश भी वही रास्ता अपना रहा है?
मालदीव के अनुभव ने यह साबित कर दिया कि छोटे या पड़ोसी देशों में भारत-विरोधी बयानबाजी एक आजमाया हुआ चुनावी नुस्खा बन चुकी है। अब बांग्लादेश में भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है। हसीना सरकार के हटने के बाद भारत के साथ रिश्ते कमजोर पड़ते नजर आ रहे हैं और कई दल विरोध को ही अपनी मुख्य रणनीति बना चुके हैं।
क्या ढाका की राजनीति को लग गया ‘मालदीव का मोइज्जू रोग’? चुनाव से पहले भारत-विरोध बना सबसे बड़ा चुनावी हथियार bangladesh-india
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति है। भारत-विरोध से न सिर्फ घरेलू राजनीति में पहचान बनती है, बल्कि बाहरी ताकतों से समर्थन मिलने की उम्मीद भी बढ़ जाती है।
हसीना के बेटे की चेतावनी
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेटे सजेब वाजेद ने हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में बांग्लादेश में बढ़ती चरमपंथी गतिविधियों को भारत के लिए गंभीर खतरा बताया। उनके मुताबिक, मौजूदा अंतरिम सरकार ने जमात-ए-इस्लामी और अन्य इस्लामिक दलों को खुली छूट दे रखी है।
सजेब वाजेद का दावा है कि अब तक इस्लामिक पार्टियों को बांग्लादेश में कभी भी 5 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिले, लेकिन मौजूदा हालात में उन्हें सत्ता में लाने की कोशिशें हो रही हैं। आरोप यह भी है कि प्रगतिशील और उदार दलों पर रोक लगाई जा रही है और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है।
यूनुस सरकार और सवाल
अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस को एक अर्थशास्त्री और सिविल सोसायटी के चेहरे के तौर पर जाना जाता है। राजनीति में उनका कोई लंबा अनुभव नहीं रहा, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका रुख कई सवाल खड़े करता है।
यूनुस को लेकर कहा जाता है कि वे भारत के प्रति न तो खुले तौर पर दोस्ताना हैं और न ही स्पष्ट रूप से विरोधी। लेकिन उनकी “तटस्थता” का असर तब दिखा, जब अंतरिम सरकार बनने के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं पर हिंसा की घटनाएं बढ़ीं। इन घटनाओं पर सरकार की चुप्पी ने भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी।
पूर्वोत्तर को लेकर भड़काऊ बयान
कुछ महीने पहले मोहम्मद यूनुस ने भी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर विवादित बयान दिया था। उन्होंने इन राज्यों को समुद्र से कटे हुए, यानी लैंडलॉक्ड इलाके के रूप में पेश करते हुए कहा कि बांग्लादेश इस क्षेत्र के लिए समुद्र का “गार्जियन” बन सकता है।
इस बयान में चीन का संदर्भ भी जोड़ा गया। यूनुस ने खुद को चीन के करीब दिखाते हुए भारत को बायपास करने की बात कही। यह बयान इसलिए भी चिंता बढ़ाने वाला माना गया, क्योंकि चीन पहले से ही पूर्वोत्तर भारत और उसके आसपास के इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता रहा है।
बढ़ता चरमपंथ, बढ़ता खतरा
बांग्लादेश में चरमपंथी गतिविधियों की खबरें नई नहीं हैं, लेकिन हाल के महीनों में इनके संकेत और मजबूत हुए हैं। वहां आतंकी प्रशिक्षण शिविर बनने की बातें सामने आई हैं। अल-कायदा से जुड़े आतंकी पहले भी सक्रिय रहे हैं और अब लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर तक सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाषण देते नजर आए हैं।
इन घटनाओं से साफ है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथ का प्रभाव बढ़ रहा है। चुनाव से पहले नेताओं की भारत-विरोधी बयानबाजी इसी माहौल को और हवा देती है।
अचानक क्यों बदली ढाका की राजनीति?
ढाका की राजनीति का भारत-विरोध के इर्दगिर्द सिमटना महज संयोग नहीं है। यह सत्ता परिवर्तन का सीधा नतीजा माना जा रहा है। शेख हसीना के दौर में भारत-बांग्लादेश रिश्ते मजबूत थे। उनके जाते ही नई सत्ता के लिए भारत से दूरी बनाना खुद को अलग दिखाने का आसान तरीका बन गया।
इसके साथ ही बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में भी बदलाव दिख रहा है। हाल के दिनों में ढाका और बीजिंग के बीच नजदीकियां बढ़ी हैं। चीन, जो भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों के लिए जाना जाता है, अब बांग्लादेश का अहम साझेदार बनता नजर आ रहा है।
इतना ही नहीं, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच भी मेलजोल बढ़ा है, जबकि दोनों देश लंबे समय तक कट्टर विरोधी रहे हैं। साझा मजहब और साझा “दुश्मन” के तौर पर भारत इन रिश्तों को जोड़ता दिख रहा है।
सत्ता शून्यता और उसका असर
फिलहाल बांग्लादेश में एक तरह की सत्ता शून्यता की स्थिति है। अवामी लीग के कई नेता या तो देश छोड़ चुके हैं या जेल में हैं। दूसरी ओर, खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी भी कमजोर स्थिति में है। खालिदा जिया खुद बीमार हैं और लंदन में हैं।
इस राजनीतिक खालीपन का फायदा वे ताकतें उठा रही हैं, जो धार्मिक और कट्टर एजेंडे के साथ आगे बढ़ रही हैं। चुनाव से पहले भारत-विरोधी बयानबाजी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
भारत के लिए क्या मायने रखता है यह सब?
बांग्लादेश में बदलता यह सियासी माहौल भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा, सीमा पार आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता सीधे तौर पर इससे जुड़ी हुई है। अगर भारत-विरोध चुनावी हथियार बना रहा, तो आने वाले समय में भारत-बांग्लादेश रिश्तों में और तनाव देखने को मिल सकता है।
फिलहाल इतना साफ है कि ढाका की राजनीति में भारत-विरोध अब सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित चुनावी रणनीति बन चुका है। सवाल यह है कि क्या यह रणनीति बांग्लादेश को स्थिरता दे पाएगी, या उसे और बड़े संकट की ओर धकेल देगी। आने वाले चुनाव इसका जवाब देंगे।
The increasing anti-India rhetoric before the February 2026 elections is a concerning trend. I found some related background information on political strategies at https://tinyfun.io/game/a-game-about-digging-a-hole, which helped put this in context.